क्रीमी लेयर को जातिगत आरक्षण!

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आज़ादी के बाद भारतीय संविधान में सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों को आगे लाने के मकसद से आरक्षण का प्रावधान शामिल किया गया था. ये प्रावधान भी रखा गया कि हर दस साल पर हालात की समीक्षा की जाएगी और उसके बाद आरक्षण की व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाएगा लेकिन इसकी समीक्षा आज तक नहीं हुई, बल्कि समय गुजरने के साथ आरक्षण का दायरा बढता ही गया.

इस आरक्षण की व्यवस्था की वजह से पिछले कुछ दशक में समाज में एक नया कुलीन वर्ग पैदा हुआ है, ये वो लोग हैं जिन्हें आरक्षण की व्यवस्था से सबसे ज्यादा फायदा हुआ.

ये लोग आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से काफी आगे निकल चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही लोगों के लिए 1992 में पहली बार क्रीमी लेयर शब्द का इस्तेमाल किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्रीमी लेयर यानि संवैधानिक पद मसलन प्रेसीडेंट, सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जज और ब्यूरोक्रेसी, पब्लिक सेक्टर कर्मचारी सेना और अर्धसैनिक बल में मेजर, कर्नल से ऊपर का रैंक पा चुके बैकवर्ड क्लास के लोगों के बच्चों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए.

इसके अलावा आर्थिक आधार पर भी क्रीमी लेयर तय किया गया. इसके मुताबिक जिस परिवार की आय तीन साल लगातार 6 लाख सालाना से ज्यादा है, वो सामाजिक या शैक्षणिक रूप से पिछड़े नहीं माने जाएंगे, उन्हें क्रीमी लेयर माना जाएगा और ऐसे परिवारों के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बार-बार कहे जाने के बाद भी क्रीमी लेयर का फॉर्मुला लागू करने से राजनीतिक दल घबराते हैं. राजनीति से लेकर सरकारी पदों पर एससी/ एसटी, ओबीसी के अंदर के कुलीन वर्ग के लोगों का कब्जा है.

और ऐसे में वो लोग बिल्कुल नहीं चाहते कि क्रीमी लेयर फॉर्मूला लागू हो और एससी/ एसटी और ओबीसी वर्ग के उन लोगों को फायदा होने लगे जो वाकई बेहद पिछड़े हुए हैं.

आरक्षण व्यवस्था के चलते अगड़ी जातियों के साथ-साथ अब अति पिछड़े, अति दलित वर्गों में भी धीरे-धीरे आक्रोश बढ़ता दिखाई दे रहा है.

इकोनॉमिक लिबरलाइज़ेशन की वजह से धीरे-धीरे सरकारी नौकरियों में लगातार नौकरियों की तादाद घटती जा रही है और प्राइवेट सेक्टर में रोजगार के जो अवसर बढ़ रहे हैं, उनका आधार क्वालीफिकेशन है.

निजी क्षेत्र तो सिर्फ योग्य और कुशल लोगों को ही रोज़गार मुहैया कराना प्रमुखतम बिंदु रखता है.

ऐसे हालात में सरकारी आरक्षण की व्यवस्था बनाए रखना सिर्फ और सिर्फ एससी, एसटी औऱ ओबीसी के कुलीन वर्ग के हितों को प्रोटेक्ट करना है जिसका इन वर्गों के उत्थान इनके हित, विकास या देश के विकास प्रगति, देशभक्ति से कोई लेना-देना नहीं है अपितु राजनीति आधारित जातिगत पकड़/ वोट बैंक बनाये रखना मात्र है.

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