रामायण में न सीता का त्याग है, और न शंबूक का वध

वाल्मीकीय रामायण आदिकाव्य है जिसका अंतिम कांड युद्धकांड है. युद्धकांड में ही श्रीराम का राज्याभिषेक वर्णित है और उसके पश्चात उपसंहारात्मक फलश्रुति के साथ काव्य समाप्त हो जाता है.

सीताजी से जुड़ा अंतिम प्रकरण नीतिपरक है जिसमें तेज, धैर्य, यश, दक्षता, सामर्थ्य, विनय, नीति, पौरुष, विक्रम और बुद्धि गुणों की प्रतिष्ठा की गई है.

तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम्
प्रदेहि सुभगे हारन् यस्य तुष्टासि भामिनि
तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः
पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा
ददौ सा वायुपुत्राय तन् हारमसितेक्षणा
हनूमान्स्तेन हारेण शुशुभे वानरर्षभः

(अयोध्या में रामराज्याभिषेक के पश्चात योद्धाओं की विदाई हो रही है. श्रीराम ने सीतादेवी को एक दिव्य हार दिया है जिसे वह हनुमान को देना चाह रही हैं लेकिन किंचित सोच में बार बार पति और वानरों की ओर देख रही हैं कि जाने इतने प्रेम से दिये उपहार को तुरंत दूसरे को दे देने पर क्या समझें?

श्रीराम समझ जाते हैं और इंगित करते हुये उनसे कहते हैं, “भामिनी! सुभग हार को उसे दो जिससे तुम संतुष्ट हो और जिसमें तेज, धैर्य, यश, दक्षता, सामर्थ्य, विनय, नीति, पौरुष, विक्रम, बुद्धि गुण नित्य उपस्थित रहते हों.”

इस पर कृष्णनेत्रा सीतादेवी ने वह हार वायुपुत्र हनुमान को दे दिया जिसे धारण कर वानरशिरोमणि सुशोभित होने लगे.)

भारतीय महाकाव्यों में अंत में फलश्रुति की परम्परा रही है. कथा के अंत में उसके पठन, श्रवण, मननादि के लाभ गिना और कभी कभी रचयिता के प्रति प्रशंसात्मक कथनों के साथ महाकाव्य समाप्त हो जाते हैं.

रामायण में भी यही है. युद्धकांड उसका अंत है जिसमें फलश्रुति भी है. वाल्मीकि लिखते हैं – बहुविधैर्यज्ञैः ससुतभ्रातृबान्धवः. श्रीराम ने पुत्रों, भाइयों और सुहृद सम्बन्धियों के साथ बहुविधि यज्ञ किये.

आयुष्यमारोग्यकरम् यशस्यम्,
सौभ्रातृकम् बुद्धिकरम् शुभम् च।
श्रोतव्यमेतन्नियमेन सद्भि,
राख्यानमोजस्करमृद्धिकामै:॥

न सीता का त्याग है और न शम्बूक का वध. इन काल्पनिक प्रसंगों को उत्तरकांड बना कर बहुत बाद में पतित पोंगापंथियों द्वारा जोड़ा गया. ऐसा आधुनिक सांख्यिकीय और भाषिक विश्लेषणों से भी सिद्ध हो चुका है. अग्निपरीक्षा प्रकरण भी क्षेपक है, उस पर फिर कभी.

बिना मूल का अध्ययन विश्लेषण किये विशेषज्ञ बनने का चलन यहीं पर है जिसके लिये शास्त्र, इतिहास, पुराणादि की विकृत और असत्य प्रस्तुति आसान मार्ग है.

ऐसे प्रकरणों से कथित प्रगतिशीलों की दुकानें चल रही हैं, वे तो उसे छोड़ने से रहे, आप तो समझिये.

~~~ निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति ~~~

– ‘शेष सनातन

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