डॉक्टर टीबी कुन्हा : नेहरू-गांधीवाद में दबाया गया एक और भारत का रत्न

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टीबी कुन्हा एक दूरदृष्टा राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानी थे. आधुनिक भारत के यशस्वी सपूत डॉक्टर टीबी कुन्हा गोवा के जनक के रूप में माने जाते हैं.

टीबी कुन्हा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपार कष्ट सह कर गोवा को 1961 में स्वतंत्रता दिलाई है. पुर्तगालियों ने 450 साल तक गोवा के ऊपर राज्य चलाया.

डॉक्टर टीबी कुन्हा का जन्म 2 अप्रैल, 1891 ई में गोवा के चंदौर नामक गांव में हुआ था. पणजी की शिक्षा-व्यवस्था से संतुष्ट न होकर कुन्हा पांडिचेरी चले गए. वहां से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद वे पेरिस गए और इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा प्राप्त की.

वहीं उन्होंने 1916 से 1926 तक एक निजी फर्म में काम किया. इस बीच डॉक्टर कुन्हा रोमां रोलां जैसे प्रसिद्ध विचारकों के संपर्क में आए.

1917 की रूसी राज्य-क्रांति का भी टीबी कुन्हा के विचारों पर प्रभाव पड़ा. वे अनुभव करने लगे कि पश्चिमी देशों का साम्राज्यवादी नियंत्रण समाप्त होना चाहिए.

उन्होंने फ्रांस के पत्रों में लेख लिख कर लोगों को भारत में अंग्रेजों के द्वारा किए जा रहे शोषण से परिचित कराया.

ब्रिटिश सरकार ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के जो समाचार पश्चिमी देशों से छिपा रखे थे, उन्हें पूरे विवरण के साथ यूरोप के पत्रों में प्रकाशित कराने का श्रेय डॉक्टर कुन्हा को ही था.

कुन्हा ने गोवा को स्वतंत्रता दिलाने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. जब तक गोवा की स्वतंत्रता पूरी नहीं होगी तब देश की स्वतंत्रता पूरी नहीं हो पाएगी, इस विचार से उन्होंने लगातार गोवा की स्वतंत्रता के लिए प्रयास किए. उन्होंने इस लड़ाई में अपना सब कुछ न्यौछावर किया.

1926 में डॉक्टर कुन्हा भारत आए. उस समय तक पुर्तगाल में सालाजार का शासन स्थापित हो चुका था और गोवा वासियों को और भी दमन का सामना करना पड़ रहा था.

डॉक्टर कुन्हा ने गोवा कांग्रेस कमेटी की स्थापना की और उसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सम्बद्ध करा लिया. इस प्रकार गोवा का स्वतंत्रता-संग्राम आरंभ हुआ.

उन्होंने गोवा के दमनकारी शासन के विरोध में अनेक पुस्तिकाएं लिखीं. ब्रिटिश सरकार ने उन पर मुकदमा चलाना चाहा तो बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एमसी छागला ने कुन्हा को निर्दोष साबित कर दिया.

18 जून, 1946 को मडगांव में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के सार्वजनिक भाषण से गोवा की पुर्तगाल से मुक्ति का खुला संघर्ष आरंभ हुआ.

24 जुलाई, 1948 को डॉ कुन्हा गिरफ्तार कर लिए गए. उन पर सैनिक अदालत में मुकदमा चला और 8 वर्ष की कैद की सजा देकर उन्हें पुर्तगाल के एक किले में बंद कर दिया गया.

1950 में आम रिहाई के समय यद्यपि उन्हें भी जेल से छोड़ दिया गया पर भारत वे 1953 में ही आ सके.

उनके भारत आते ही मुंबई में ‘गोवा एक्शन कमेटी’ का गठन किया गया. इसके प्रचार का परिणाम था कि 1954 में दादरा और नागर हवेली ज़िलों में पुर्तगाल की सत्ता समाप्त हो गई.

डॉक्टर कुन्हा का निधन 26 सितंबर, 1958 को हुआ था. डॉक्टर टीबी कुन्हा को 1959 में ‘वर्ल्ड पीस काउंसिल’ ने अपने स्टॉकहोम के अधिवेशन में मरणोपरांत स्वर्णपदक से सम्मानित किया गया.

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