शिक्षा के दो सूत्र : Observation and Expression

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आपके घर में 30-35 बच्चे-कच्चे हों…. और आपकी बीवी को पहले तो उनको बनाना खिलाना हो…. ऊपर से धोना-मांजना भी हो…. तो काम के बोझ की मारी वो बेचारी क्या करेगी?

1. अपनी ऐसी की तैसी कराओ. सालों… मैंने ठेका लिया है तुम्हारे बाप का? नहीं बनाती खिलाती. जब खाओगे ही नहीं तो मांजना भी नहीं पडेगा.

2. पर कुछ न कुछ तो खिलाना ही पडेगा, वरना नौकरी चली जायेगी. चलो एक-एक रोल बना के टिश्यू पेपर में लपेट के हाथ में थमा दिया. हो गया काम… अब धोना-मांजना तो नहीं पड़ेगा न.

आज से कोई 12-15 साल पहले, मेरी बेटियाँ लखनऊ के महानगर स्थित वीरेंद्र स्वरुप पब्लिक स्कूल में पढ़ती थीं. 4th या 5th में….

हिंदी का एक पाठ था…. उसमें एक प्रश्न था कि मामाजी भांजे से क्यों नाराज थे? टीचर ने किताब से टीप के उत्तर लिखा रखा था.

मैंने पहले तो बच्चों को वो कहानी दुबारा सुनायी…. फिर उनसे पूछा कि अब बताओ, मामा जी क्यों नाराज थे?

बेटियों ने सही-सही कारण बता दिया. मैंने कहा…. शाबाश… एकदम सही. अब यही उत्तर नोटबुक में लिख दो. दोनों ने लिख दिया. सही-सही…

अगले दिन खुश-खुश स्कूल गयीं तो मैडम जी ने उनके उत्तर काट दिए… वही लिखो जो मैंने लिखाया है.

बेटियाँ बड़ी मायूस…. पापा, जवाब तो गलत था…..

अपन चढ़ बैठे स्कूल पे…. पहुंचे मैडम के पास…. क्यों काटा भाई जवाब?

उन्होंने कहा, जो मैंने लिखाया वही रट के लिखो.

क्यों? वही क्यों लिखें? अपने मन से मौलिक लिखें तो क्या हर्ज़ है?

अजी 35 बच्चे हैं क्लास में. सब अलग-अलग लिखेंगे तो मैं किसका-किसका चेक करुँगी?

फिर मौलिक लिखने पे गलतियां ज़्यादा करते हैं. पैरेंट्स की अपेक्षा होती है कि मैं सबका एक-एक अक्षर चेक करूँ…. बिंदी की भी अगर गलती है तो उसे point out करूँ….

सो मैडम ने समस्या का उपाय ये निकाला कि मौलिक लेखन पे ही रोक लगा दी. रट के, नक़ल मार के लिखो. न गलतियां होंगी, न जांचनी पड़ेंगी….

जी हाँ, आज की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या है ये…. parents का copies की checking, correction के लिए टीचर्स और स्कूल को बाध्य करना.

मित्रों, कभी आप स्वयं स्टॉप वाच से टाइम देख के अपने बच्चे का एक पेज काम चेक कीजिये. देखिये कितना समय लगता है. एक या दो मिनट….

35 बच्चों में कितना लगेगा? 40 मिनट का पीरियड होता है. टीचर कब पढ़ायेगा और कब copy चेक करेगा?

आजकल हर स्कूल में टीचर को 5-6 पीरियड लेने होते हैं…. 200 copies…. कब कैसे चेक करेगा…. ऊपर से आप लोगों का दबाव…. एक-एक अक्षर चेक करो….

आपके इस अनर्गल दबाव और दुराग्रह ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को खा लिया है…. महंगे स्कूलों में आजकल टीचर्स सारा समय सिर्फ copy जांचने और ऊपरी रखरखाव पे खर्च कर रहे हैं…. सचमुच की शिक्षा के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति….

रोल बना के हाथ में पकड़ा दो, धोना-मांजना तो नहीं पड़ेगा….

सचमुच की शिक्षा में copy correction का कोई स्थान नहीं….

Its a wastage of time…. इसके अलावा इसके कोई रिजल्ट्स भी नहीं हैं….

एक अभिभावक के रूप में अपने स्कूल से कहिये, teachers lecture method…. story telling method से पढ़ाएं….

बच्चों को अभिव्यक्ति, मौलिक लेखन के लिए प्रेरित करें…. गलतियां होंगी…. होने दें…. आगे चल के बच्चा स्वयं अपनी गलतियां सुधार लेता है….

शिक्षा के दो सूत्र…. observation & expression….

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  1. पर आपने हल तो बताया ही नही कि टीचर बेचारी क्या करे?

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