बोले राम सकोप तब, भय बिनु होहि न प्रीति

पुलिस को भी सेना की तर्ज़ पर तैयारी करवाना चाहिए अब… उन्हें नेताओं और सिविलियन्स के चंगुल से एक लिमिट के बाद आज़ाद रखना ही बेहतर होगा.

वे सिर्फ अपने वरिष्ठ अधिकारी की सुनें और वरिष्ठ अधिकारी केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायालय या सेनाध्यक्ष की.

बाकी के CM, मिनिस्टर, या कुकुरमुत्ते जैसे गली गली उग आये नेताओं या आंदोलनकारियों की परवाह पुलिस को नहीं करनी चाहिए…

ये मैं हवा में नहीं कह रहा बल्कि इसके पीछे पुलिस को मजबूत बनाने का इरादा मात्र है, जिस प्रकार सेना और सुरक्षा एजेंसीज को विशेषाधिकार हैं पुलिस को भी अब मिल जाने चाहिए.

उन्हें सैलरी, पद और अनुशासन भी उसी स्तर का हो जैसा सेना या सुरक्षा एजेंसीज का होता है… क्योंकि ऐसी डरी-सकुची, शक्ति और विशेषाधिकार विहीन पुलिस हमारी रक्षा करने में सक्षम नहीं है…

देश में लगभग 2000 नागरिकों पर 1 पुलिस कर्मी है? ऊपर से लचर न्याय व्यवस्था जिससे वे वर्षों से खेल खेलते आ रहे हैं…

ये बात जनता खासकर अपराधिक प्रवृत्ति रखने वाले गुट भली भाँति जानते हैं… सो वे कहीं भी कुछ भी करने से पहले लेशमात्र नहीं सोचते चाहे जहाँ तोड़ फोड़ करते हैं, किसी को भी मारते-पीटते और गाली गलौच करते हैं…

जातिगत आरक्षण के लिए आंध्र प्रदेश के कुपा समाज को ही देख लीजिये… सरकारी संपत्ति का क्या हश्र कर रहे हैं?

कल दिल्ली में भी वामपंथी छात्रों ने प्रधानमन्त्री के लिए जिस तरीके की भाषा और आचरण धारण किया वो किसी भी लोकतंत्र के मुँह पे तमाचे से कम नहीं था?

जिसके लिए नफरत फैलाने वाले वामपंथी छात्रों को भरपूर प्रसाद मिलना ही चाहिए था जो कि मिला भी.

वहीं दो दिन से सोशल मीडिया में वायरल हुई पड़ी एक फ़ोटो जिसमें एक 25 साल का युवक दिलीपन महेंद्रन जो कि स्वयं को पेरियार का समर्थक बतलाता है उसनें तिरंगे को जलाकर बाकायदा फ़ोटो पोस्ट कर दी! जिसके चलते उसे गिरफ्तार किया।

गिरफ्तारी के समय भी उसने पुलिस वालों के साथ बेशर्मी ओढ़ते हुए सेल्फ़ी निकालकर वापस पोस्ट की? आप सोचिये ऐसे लोगों में पुलिस को लेकर कितना भय होगा? वे उससे कितना डरते होंगे…

मैं ये नहीं कह रहा कि पुलिस बर्बर हो जाए साधारण जनमानस से वो दोस्ताना रवैया ही रखे पर दुष्टों को तो थर-थर कांपना ही चाहिए… तुलसी दास जी कह गए हैं “भय बिनु होहिं ना प्रीति”….

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