तारीख़ पर तारीख़… तारीख़ पर तारीख़… तारीख़ पर तारीख़…

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भारतीय लोकतंत्र के कई आयामों में एक महत्वपूर्ण आयाम है- ‘‘त्वरित न्याय के साथ जीवन जीने की गारंटी.”

कहा भी गया है कि देर से मिला न्याय; न्याय नहीं होता. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से संविधान लागू होने के छियासठ वर्षों के बाद भी इस दिशा में हमारी प्रगति नकारात्मक ही कही जा सकती है.

आज स्थिति यह है कि देशभर के न्यायालयों में लगभग 3 करोड़ मुक़दमे लंबित हैं. न्यायिक प्रणाली की सर्वोच्च संस्थाएँ इस स्थिति पर अपनी चिंता ज़ाहिर कर चुकी है.  इस संदर्भ में हैदाराबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज वी. वी. राव का वह बयान काफ़ी प्रासंगिक है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “भारतीय न्यायालयों को मुक़दमों का ढेरसाफ़ करने में तक़रीबन 320 साल लगेंगे.”

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई एक कदम भी उठाए गए, यथा- फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन, लोक अदालतों का आयोजन, मोबाइल अदालतों के गठन का फ़ैसला, ग्राम कचहरी के फै़सलों की स्वीकार्यता बढ़ाने की क़वायद, अनुसूचित जाति-जनजाति पर अत्याचार के मामलों को शीघ्र निपटाने के लिए विशेष अदालतों के गठन का निर्णय आदि… तथापि मुक़दमों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है.

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में ग्रीक के विद्वान सोलोन ने कड़े संघर्षों से गुज़र कर ‘न्यायिक व्यवस्था’ की नींव रखी थी. एक ऐसी व्यवस्था; जिसका न सिर्फ़ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक महत्व है बल्कि आम आदमी के लिए जि़ंदगी के हर पग पर जिसके महत्वपूर्ण मायने हैं.

न्यायिक व्यवस्था; स्वाभावगत मानवीय सरोकारों और नैसर्गिक नियमों की वह सहज अवस्था है, जो इंसान को सम्मानजनक जि़ंदगी जीने का अधिकार देती है. इसी भावना से अभिभूत हो हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘न्याय’  को स्वतंत्रता और समता से ऊपर रखा.

संविधान में उल्लिखित नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 38 कहता है कि- “राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा.”

यही भारत की न्याय प्रणाली का सर्वोच्च लक्ष्य है. लोक कल्याण और मानव मात्र के हितों का संरक्षण इसका आदर्श है. यहाँ योग्यतम की उत्तरजीविता नहीं अपितु हर एक की उत्तरजीविता का प्रावधान है. न्याय की पूरी संकल्पना में ‘त्वरा‘ यानि ‘शीघ्रता’ का विशेष महत्व है. माना जाता है कि जिस दिन आपने न्याय के वास्ते आवेदन दिया उसी दिन मानो आपको फ़ैसला मिल गया.

बेशक, ये आदर्श स्थितियाँ हैं. लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी बयान करती है. भारतीय संदर्भ में जटिल न्यायिक प्रणाली व न्यायिक प्रक्रिया के कारण ‘त्वरित न्याय’ दूर की कौड़ी साबित हो रही है.

लोगों का न्यायिक व्यवस्था से भरोसा ख़त्म होता जा रहा है. और ख़त्म हो भी क्यों न… संपत्ति के बँटवारे से लेकर तलाक के मुक़दमों तक हर मामला इस तरह लटका रहता है कि कई बार तो दावा करने वालों की जि़ंदगी ख़त्म हो जाती है.

ऐसी स्थिति में आम आदमी न्याय की मूल भावना को समझ ही नहीं पाता है. या यूँ कहें कि न्याय उस पर थोपा जाता है. वर्तमान हालात में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली काफ़ी असंतोषजनक कही जा सकती है. पूरी प्रक्रिया इतनी उलझी हुई और पेचदार है कि अदालतों के प्रति लोगों में अविश्वास का माहौल बनता जा रहा है.

न्याय तो देर-सबेर हो जाता है, लेकिन वह दिखता नहीं है. जबकि न्याय सिर्फ़ होना ही नहीं चाहिए, इसे होते हुए दिखना भी चाहिए और वह भी जल्द से जल्द. लेकिन हमारे यहाँ तो मुक़दमों को दीर्घजीवी होने का आशीष मिला हुआ है.

पीढि़याँ गुज़र जाती है- फ़ैसले के इंतज़ार में. तारीख़ों के फेर में लोग हताश और निराश हो, सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ देते हैं. ऊपर वाले के दरबार में अर्ज़ी लगाना वो ज़्यादा मुनासिब समझते हैं. ऐसा स्वभाविक भी है. कुछ बानगी देखिए –

शुरूआत करते हैं, भारतीय संविधान के पितामह डॉ भीमराव अंबेदकर से. बॉम्बे में एक मामला डॉ अंबेदकर की ज़मीन पर अवैध क़ब्जे़ का था. इसका फै़सला आज़ादी के पूरे 53 सालों बाद आया, जब बाबा साहब के निधन को भी पूरे 44 साल हो चुके थे.

सोचने की बात है कि अगर भारतीय संविधान के पितृ पुरुष का ऐसा भाग्य था तब उन लाखों अभागों का क्या होगा, जो न तो कानून की पेचीदगियाँ जानते हैं और न ही जिनके पास इतना सामर्थ्य है कि वे सही ढंग से अपने मुक़दमे की पैरवी ही करवा सकें.

सन् 1975, तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या. उस समय का सबसे बड़ा पॉलिटिकल मर्डर. निचली अदालत से फै़सला 39 सालों बाद आया. मामला उच्च न्यायालय में.

सन् 1984, भोपाल गैस कांड. यूनियन कार्बाइड के फैक्ट्री से निकली ज़हरीले गैस ने तक़रीबन बीस हज़ार लोगों को मौत के आगोश में ले लिया. हज़ारों लोग विकलांग हो गए. निचली अदालत से ही निर्णय आने में ही 26 साल लग गये.

सन् 1990, रूचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ और आत्महत्या मामला. हरियाणा के पूर्व डी.जी.पी.  एस.पी.एस. राठौड़ को ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया. छह महीने की सजा. सत्र न्यायालय ने सजा को बढा कर डेढ़ साल किया. मामले की सुनवाई तीन राज्यों में हुई. केस अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है.

न्याय प्रणाली की धीमी चाल का एक नायाब उदाहरण दिल्ली की एक अदालत ने 2007 में पेश किया. मुक़दमा चला 21 साल और सज़ा हुई 28 दिनों की. मामला सोने की तस्करी का था. अदालत ने दो आरोपितों, ज्ञान प्रकाश शर्मा (60 वर्ष) और ज्योति प्रसाद (58 वर्ष) की उम्र को ध्यान में रखते हुए नरम रूख अपनाया. और न्याय का मक़सद पूरा करने के लिए 21 साल से चल रहे मामले में 28 दिन की कैद और 25 हजार रूपये का जुर्माना मुक़र्रर किया.

कुछ वर्ष पूर्व बिहार में निगरानी की एक विशेष अदालत ने राज्य पथ परिवहन निगम के नवादा डिपो के पूर्व कंडक्टर उमाकांत पांडे को 1986 में दर्ज़ ग़बन के एक मामले में सज़ा सुनाई. जानकर आश्चर्य होगा कि 17 रुपये 85 पैसे के ग़बन का यह मामला क़रीब 23 वर्षों तक चला. पूर्व कंडक्टर को सात यात्रियों को बिना टिकट यात्रा करवाने में नामज़द किया गया था. पीसी एक्ट के तहत दोषी ठहराये गए उमाकांत को एक वर्ष की क़ैद और 500 रुपये जुर्माना किया गया.

ये तो कुछ ऐसे मामले हैं, जो पूरी व्यवस्था को आईना दिखाते हैं. याद कीजिए एक दशक पूर्व के उस दौर को जब भारत की शहरों में न्यायपालिका के गुणगान का ज़ोर था.

जेसिका लाल हत्याकांड, प्रियदर्शी मट्टू बलात्कार कांड, शिवानी भटनागर हत्याकांड, तंदूर कांड (नैना साहनी हत्याकांड), नीतीश कटारा हत्याकांड जैसे कुछ एक मामलों में प्रभावशाली और दबंग माने जाने वाले आरोपितों को अदालत ने दोषी ठहराते हुए जेल के सीख़चों के पीछे भेज दिया था.

इन केसों के माध्यम से न्यायपालिका की नैतिक ब्रांडिंग का एक दौर चला. लेकिन सच तो सच होता है, इसे बदला नहीं जा सकता.

ग़ौर कीजिए, इनमें से कई केस ऐसे हैं, जिसका फै़सला निचली अदालत से ही आने में 8 से 10 साल लग गए. और वो भी मीडिया की अतिसक्रियता के बाद. कुछेक जेसिकाओं और प्रियदर्शिनियों को छोड़ दें तो ऐसे बदकि़स्मतों की कमी नहीं है जो फ़ैसले के लिए आज भी न्यायिक सक्रियता का इंतज़ार कर रहे हैं.

निचली अदालतों की स्थिति तो और भी बदतर है. वहाँ ‘तारीख पर आइये और नई तारीख ले जाइये‘ का जुमला सटीक बैठता है. आम आदमी तो आम आदमी, सरकार भी न्यायिक प्रणाली से पीडि़त है. उसे भी समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है.

लंबित मामलों के लगभग 30 फ़ीसदी में सरकार शामिल है. अदालतों में कई ऐसे मामले हैं जिसकी सुनवाई 50-60 सालों से चल रही है. न्याय मिलने में इतना विलंब होने से जहाँ दोनों पक्षों के बीच अदावत बढ़ती है, ठीक उसी रफ़्तार से मुख्य मुक़दमे से जुड़े अन्य मुक़दमों की संख्या भी बढ़ती ही जाती है. स्वाभाविक रूप से किसी चीज को आप जितना लटकायेंगे, वह उतनी ही लंबी खिंचती चली जाएगी और उसकी गुणवत्ता भी उसी अनुपात में प्रभावित होगी.

स्थितियाँ कितनी बदतर है, बताने की ज़रूरत नहीं है. विचारणीय है कि आखिर वे कौन-कौन से कारक हैं; जो व्यवस्था को नकारा बना रहे हैं ?

इस पूरे परिदृश्य का सबसे हास्यास्पद पहलू तो यह है कि मुक़दमों के निपटारे के लिए कोई समय-सीमा नहीं है. पूरी प्रणाली सदियों पुरानी कानूनी किताबों के दायरे में ही उलझी हुई है. लगभग सभी कानून अंग्रेज़ों के समय के ही हैं. समय के अनुरूप कानूनों में जितना परिवर्तन अपेक्षित था, वह नहीं हो पाया है. कानूनी प्रावधानों में इतने लूपहोल हैं कि हमेशा उसकी नई व्याख्याएँ संभव हैं. और कहीं न कहीं यहीं से विलंब की भी शुरुआत होती है.

आज भारतीय अदालतों में स्वीकृत पदों की तुलना में जजों की भारी कमी है. हर जज की अदालत में इतने मामले हैं कि चाह कर भी उनकी सुनवाई समय पर संभव नहीं है. गौरतलब है कि कुछ शोधों में यह बात सामने आई है कि विकसित देशों के मुकाबले हमारे जज पाँच गुना ज्यादा मामले निपटाते हैं (गुणवत्ता की बात छोड़ दीजिए).

एक आँकड़े के अनुसार- ‘प्रति दस लाख व्यक्तियों पर भारत की तुलना में जजों की संख्या अमेरिका में 10 गुना और कनाडा में 7 गुना है.’ आँकड़े हैरान करते हैं और सरकार की लापरवाही को बेपर्दा भी.

सरकार हालात से निपटने के लिए पैसा ख़र्च करने में कोताही बरत रही है. आश्चर्य तो इस बात का है कि मुख्य न्यायाधीश आते-जाते रहे लेकिन किसी ने सरकार पर धनराशि आवंटित करने के लिए दबाव नहीं डाला.

जजों की कमी के कारण आज भारत में जेलों की स्थिति भी नारकीय होती जा रही है. जेलों में बंद 80% से भी ज़्यादा कैदी विचाराधीन हैं. कई तो इतने लंबे समय से जेल में हैं कि अगर उन्हें सज़ा हो गई होती तो वे बहुत पहले ही रिहा हो जाते. सोचने की बात है कि क्या यह मामला मानवाधिकार के हनन का नहीं बनता है?

अब ज़रा गौर कीजिए भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर, जो हमेशा विवादों के घेरे में रहती है और इसमें पारदर्शिता का भी अभाव दिखता है. भारतीय न्यायपालिका संभवतः दुनिया की इकलौती न्याय प्रणाली है जो उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों का चुनाव स्वयं करती है.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों राष्ट्रीय न्यायिकआयोग कानून रद्द करते हुए कॉलेजियम व्यवस्था को जारी रखा है. वर्तमान व्यवस्था कितनी पारदर्शी और विश्वसनीय है इसका अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन जजों के बारे में उच्चतर न्यायालयों ने प्रतिकूल टिप्पणियाँ की हैं, उन्हें भी बड़े मुक़दमों की सुनवाई करने देने और प्रोन्नति देने में कोई दिक्कत नहीं होती है.

एस. एल. भायना दिल्ली उच्च न्यायालय की तल्ख़ टिप्पणी के बाद भी इसी उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश हो जाते हैं और पटना उच्च न्यायालय की कड़ी आलोचना के बाद भी मुनी लाल पासवान, लालू प्रसाद यादव के आय से अधिक संपत्ति के मामले की सुनवाई करते रहते हैं.

हालाँकि कॉलेजियम में सुधार के लिए सुनवाई शुरू हो चुकी है.  मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर के साथ मिलकर सरकार ‘मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीजर’ बना रही है, जो फरवरी माह तक अपने अंतिम स्वरूप में आ सकता है. लेकिन इस पूरे विवाद के कारण 14 अप्रैल 2015 के बाद से हाईकोर्टऔर सुप्रीम कोर्ट में कोई नियुक्ति नहीं हुई है. जजों  की पदोन्नति और स्थानान्तरण का काम भी नहीं हो रहा है.

परिणाम सामने है- देश के आठ उच्च न्यायालयों में फुलटाइम चीफ जस्टिस नहीं हैं. उच्च न्यायालयों में जजों के कुल 443 पद (स्वीकृत पदों का कुल 43 प्रतिशत) रिक्त हैं.

अब व्यवस्था में भ्रष्टाचार की बात करते हैं. पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र के एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि 29% लोग मानते हैं कि भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता हमारी न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या है.

दरअसल निचली अदालतों में तो भ्रष्टाचार एक जीवन शैली बन चुकी है. यहाँ उच्चतम न्यायालय के तात्कालीन मुख्य न्यायाधीश एच. पी. भरूचा का वह बयान काफी महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने कहा था कि- “26 फ़ीसदी जजों ने भ्रष्टाचार की तमाम हदें तोड़ दी है.” इस स्वीकारोक्ति के बाद शेष कुछ कहने को नहीं रह जाता है. स्थिति का अंदाज़ आप स्वयं लगा सकते हैं.

फ़ैसलों के आने में हो रही देरी के लिए वकील समुदाय भी कम दोषी नहीं है. मामला जितना लंबा चलता है, वकीलों की मुट्ठी भी उसी अनुपात में गरम होती है. ऐसा नहीं है कि हर वकील की ऐसी ही मंशा होती है. लेकिन जिन्हें अपनी क्षमताओं पर विश्वास नहीं होता है, वे ऐसा कर रहे हैं. और ऐसे वकीलों की संख्या आज काफ़ी बढ़ भी रही है.

अगर हम इसके कारणों पर ग़ौर करें तो आज अधिकांशतः वही युवा वकालत को पेशा बना रहे हैं, जिनके या तो बाप-दादा इस पेशे से जुड़े थे या फिर वे लोग जिनके पास कैरियर का कोई अन्य विकल्प नहीं बचा होता है. स्वाभाविक रूप से ऐसे वकीलों में एक असुरक्षा का भाव होता है और वे कभी अपने पेशे के प्रति ईमानदार नहीं हो पाते हैं.

कुल मिलाकर, कमियों का अंतहीन सिलसिला है. और ये कमियाँ हमारी न्यायप्रणाली की गुणवत्ता को तो प्रभावित करती ही है, साथ ही आम लोगों का व्यवस्था से भरोसा भी तोड़ती है.

एक सर्वेक्षण में यह बात भी उभरकर सामने आई है कि 75 फ़ीसदी लोगों का किसी न किसी कारण से न्याय प्रणाली पर भरोसा नहीं रहा है. आए दिन जिस रफ़्तार से मुक़दमों की संख्या में इज़ाफ़ा हो रहा है और मामलों के निपटारे में अदालतों की साझी अकर्मण्यता दिख रही है, उसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.

कौटिल्य ने कहा था कि- “अगर राज्य द्वारा न्याय मिलने में विलंब होगा तोसमाज में मत्स्य न्याय का वर्चस्व बढेगा.” इस कथन को आज के हालात में माफि़याओं एवं विभिन्न संगठनों द्वारा खड़ी कर ली गई समानान्तर न्याय व्यवस्था के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन पता नहीं हमारी शासन व्यवस्था को कब इस समस्या की गंभीरता का अंदाज़ होगा?

वैसे लोकतांत्रिक प्रणाली में व्यवस्था को कोसना सबसे आसान काम होता है. लेकिन बात व्यवस्था को कोसने तक की नहीं है, बात है भारतीय गणतंत्र की आत्मा की जो अदालतों में बड़े आराम की नींद सो रही है और बाहर से सब कुछ ठीक-ठाक दिखता है. लेकिन कुछ भी ठीक नहीं है.

आम आदमी चुप है लेकिन इस चुप्पी के अंदर के आक्रोश से व्यवस्था को डरने की ज़रूरत है. लंबित वादों की संख्या एक बार फिर से देखिए- लगभग तीन करोड़. शुक्र है, भारत में गृह युद्ध की नौबत अब तक नहीं आई. लेकिन धैर्य की भी अपनी सीमा होती है, हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए.

आज ज़रूरत है- मुक़़दमों के निपटारे की समय-सीमा तय की जाए. पूरी प्रक्रिया एवं प्रणाली को लोचदार बनाया जाए. मुक़दमों के निपटारे के लिए स्थानीय तौर पर अलहदा कानूनी तंत्र बने. कोर्ट के बाहर मामले निबटाने को बढ़ावा दिया जाए. अधिक से अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाए. न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रियाको पारदर्शी बनाया जाए.

समेकित इलेक्ट्रॉनिक न्याय प्रणाली की शुरुआत की जाए. लोक अदालतों एवं अन्य विशेष प्रकार के न्यायालयों का अधिक से अधिक संख्या में गठन किया जाए. न्यायालयों में छुट्टियों की संख्या कम की जाए. उन वकीलों एवं जजों पर जुर्माना किया जाए जो जानबूझ कर मामलों को लटकाए रहते हैं. उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालयों के बीच भी अदालतें हों…

भारतीय शासन व्यवस्था में हो सकता है ये सारी बातें दिवास्वप्न प्रतीत होती हों लेकिन इसे धरातल पर उतारने की ज़रूरत है. क्योंकि त्वरित न्याय के लिए व्यवस्थागत परिवर्तन आज की जरुरत है… और ये परिवर्तन इसलिए भी ज़रूरी है ताकि सभी को उनके जीते जी न्याय मिल सके.

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