मासूम बच्चा भी पूछ बैठता है : बाबू जी! कुछ गड़बड़ न था तो छुपाया काय कूं था

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नेता जी सुभाष पर जेरेबहस हर सनसनी को छोड़ पहले यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि देश में मौजूद दो कानूनों : आर्काइव एक्ट जिसके तहत 30 साल और सूचना का अधिनियम जिसमे 20 साल बाद सभी सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाने चाहिए…. के मौजूद होने के बाद भी नेता जी सुभाष सहित गांधी जी, पंडित नेहरू तक जैसे तमाम लोगों और आपातकाल जैसी तमाम घटनाओं की सभी फाइलें अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गयीं?

बड़ा मुद्दा यह नहीं है कि सूचनाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह पूरी तरह अवधारणाओं का खेल है और किसी भी जिंदा समाज में तथ्यों के सामने आते जाने पर अवधारणाएं बदलने, सुधरने के काम होते रहते हैं जिनमे समय लगता है।

लेकिन यह सवाल जरूर सामयिक है कि देश में संवैधानिक तौर पर अधिकतम 30 साल गोपनीयता के कानून के बाद सभी दस्तावेज नियम मुताबिक स्वतः सार्वजनिक क्यों नहीं किये जाते रहे?

आप जब नियम के मुताबिक कोई काम नही करेंगे तो उसे नियमाकूल करते समय बतकुच्चन होगी ही।

सुभाष बाबू पर भी सत्तर के दशक में ये 30 सालों की मियाद पूरी होने पर संसद में सवालों सहित आवाजें उठने के बाद भी अगर सरकारों ने दस्तावेजों का डिक्लासिफिकेशन हो जाने दिया होता तो आज तमाम बतकुच्चन इन बातों पर 30-35 साल पुरानी हो चुकी होती और कितना पानी बह निकला होता।

याद रखिये… समाज अपने हीरो को कभी मरने नहीं देना चाहता। ऐसे में सुभाष जैसे व्यक्तित्व की मौत पर शंकाओं के बीच निजामों के इन रहस्यमयी तौर तरीकों ने आज भी समाज के हीरो को जिंदा रखा है।

वो क्या है कि… बड़ी-बड़ी तमाम बातों के बीच मुहल्ले का मासूम बच्चा पूछ बैठता है : बाबू जी! कुछ गड़बड़ न था तो छुपाया काय कूं था…?

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