कलाकारों को अब अवार्ड नहीं, सीधे मोक्ष की दरकार

कुछ साल पहले की बात है, सर्दियों में ही लगन का समय था. हम हरिश्चंद्र घाट की तरफ से आ रहे थे.

रास्ते में एक गाइड दिखाई दिया जो कुछ विदेशियों को घुमा रहा था. सामने से एक बारात आ रही थी.

उसको देखकर विदेशी सैलानी ने पूछा: What is this?

गाइड बोला: This is the band party of marriage ceremony.

तभी कुछ लोग एक अर्थी ले के गुजरे. कोई साधु महात्मा या सौ साल के करीब हो कर कोई मरता है तो परलोक सिधारने पे लोग दुःखी नहीं होते. बैंड बजाते, नाचते हुये लोग जा रहे थे, अर्थी पर गुब्बारे भी सजे थे.

ये देख कर विदेशी ने फिर पूछा: What is this?

गाइड बोला: This is the band party of ‘death ceremony’ !!

इस पर सैलानी मुस्कुरा दिए.

ये घटनाक्रम 2-3 मिनट में हो गया. क्योंकि हल्का सा ट्रैफिक जाम लग गया था इसलिए हम भी रुक गए थे.

तो साहब ये बनारस है. लोग जीविका कमाने कहीं भी जाते हों, पर मरने यहाँ आते हैं.

गाइड ने गलत नहीं कहा था. मृत्यु भी यहाँ एक उत्सव है और कहते हैं कि श्मशान की भस्म महादेव के लिए श्रृंगार की वस्तु है.

तो जब मल्लिका जी की माता जी गुजर गयीं तो मृत शरीर के समक्ष उनका नृत्य कतई बुरा नहीं लगना चाहिए. हो सकता है उनकी माँ की इच्छा रही हो.

हम तो डॉ० विक्रम साराभाई के बिना अंतरिक्ष विभाग और इसरो की कल्पना भी नहीं कर सकते थे.

वे भी बड़े हठी थे. बचपन में दोनों हाथ से हैंडल छोड़ कर और आँख बन्द कर के साइकिल ढलान पर से नीचे चला लेते थे!

बहरहाल, किस्सा साराभाई versus नरेंद्रभाई क्यों हुआ इस पर ज्यादा मन्थन मत कीजिए.

क्या है कि कलाकारों को अब अवार्ड नहीं सीधा मोक्ष की दरकार है. वे सृष्टि के गूढ़ नियम जान चुके हैं…

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