ये उनकी गाथा है जिनके लिए हम कहते हैं कि ‘अगर वे होते तो देश ऐसा होता’

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आज मन बड़ा विचलित है. यही सोच कर कि सुभाष बाबू पे क्या लिखें. ऐसा लगता है जैसे आज कुछ है, कोई त्यौहार, कोई उत्सव है. कुछ विशेष है लेकिन या तो हम समझ नहीं पा रहे या समझते हुये भी मना नहीं पा रहे.

किसी महान व्यक्ति का जन्मोत्सव मनाया जाता है लेकिन आज सुभाष बाबू की मौत की चर्चा है.

जो कुछ भी हो ये एक अलग बयार है जब हम राष्ट्रपिता, राष्ट्रपति या किसी पूर्ववर्ती राष्ट्राध्यक्ष को लेकर उत्साहित नहीं हैं बल्कि अपने ‘देशनायक’ की तलाश कर रहे हैं. मेरी एक विनती है.

फाइलों में चाहे जो भी निकल के आये सुभाष बाबू की मौत का तमाशा मत बनाइये. ये कोई रहस्यमयी उपन्यास नहीं है.

उनका जीवन ही अपने आप में इतना बड़ा ग्रन्थ है जिसे पढ़ने समझने में सरकारों की पीढ़ियां खप जाएँगी. उनके विचार युवाओं तक पहुंचाइये जो इतनी ऊर्जा भर दे कि हर बच्चा हर किशोर सुभाष हो जाये.

सुभाष बाबू भी बड़े विचित्र आदमी थे. जब सिविल सेवा की परीक्षा पास कर ली थी तो चुपचाप नौकरी करनी चाहिए थी. स्वाधीनता संग्राम में क्यों कूदे? कांग्रेस से क्यों जुड़े?

कांग्रेस में आ भी गए तो उसके अध्यक्ष क्यों बने? बन भी गए तब भी गांधी बाबा के नक्शेकदम पे चलना चाहिए था. नहीं चल सके तो भी देश में रहते. भाग कर यूरोप क्यों चले गए?

चले भी गए तो हिटलर से मिलने की क्या ज़रूरत थी? मिल भी लिए तो उन फौजियों को अपने साथ मिलाने की क्या ज़रूरत थी जो ब्रिटेन के लिए विश्वयुद्ध में लड़े थे?

फिर पनडुब्बी में बैठ कर जापान और बर्मा जाने की क्या ज़रूरत थी? आज़ाद हिन्द फ़ौज बना तो लिए लेकिन क्या कभी खुद फौजी ट्रेनिंग ली थी?

आँखों पे तो चश्मा था ठीक से देख भी नहीं सकते थे. क्या अपनी इस फ़ौज से अंग्रेजों को सचमुच भगा सके?

सुभाष बाबू को मर के भी चैन नहीं मिला. जब हवाई दुर्घटना में नहीं मरे तो गुमनामी बाबा बन गए. क्यों बन गए? सामने आना चाहिए था न.

ये एक ऐसे व्यक्ति की गाथा है जिसे सुनने मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सुभाष बाबू उनमे से थे जिन्हें हम कहते हैं कि ‘अगर वे होते तो देश ऐसा होता’.

क्या आज का युवा वर्ग ये सोच सकता है कि मुझे अपने ‘करियर’ में इतने सारे काम करने हैं? वो भी निःस्वार्थ…. निष्कपट….??

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