पिकनिक मनाने आये और यूं ही फूंक दिया थाना!!!

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इतिहास एक दिन में नहीं बनता और न ही लिखा जाता है. पत्रकारिता वो कला है जो धीरे-धीरे समकालीन परिदृश्य को एक-एक टुकड़ा इकट्ठा कर के इतिहास लेखन को पूर्ण करने में सहभागिता निभाती है.

Journalism शब्द journal से ही बना है जिसका मतलब है a chronicle or a diary of events. दुर्भाग्य से पुराने जमाने में ऐसा नहीं होता था.

फौरी तौर पर नजर डालें तो कुछ घुमंतू जीव या विचारक अपने कालखण्ड का समग्र इतिहास लिखते थे, वो भी राजाओं का, आमजन का नहीं.

मेरे जन्म से पहले आदर्शवादी पत्रकार थे. फिर ‘माल’वादी, प्रोपेगैंडा वादी आये और अब तो बे-सिर-पैर वादी हो गए हैं.

ऑनलाइन पत्रकारों की भीड़ में आपको समझ में नहीं आयेगा कि कौन क्या कह रहा है और क्यों कह रहा है.

अब क्योंकि बड़े बड़े न्यूज़ पेपर मैगज़ीन घरानों ने अपनी अलग न्यूज़ वेबसाईट खोल ली हैं तो उनको लिखने वाले भी चाहिए.

दरसअल लिखने वालों की कमी नहीं है, कमी है उन लोगों की जिनको विषयवस्तु की गहरी समझ हो.

नामी गिरामी पत्रकार मुफ़्त में नहीं लिखते; उन्हें पता है कि उनके विचारों की कितनी कीमत है और वो उतना वसूलते भी हैं.

आप जब भी कोई ऑनलाइन पत्रिका पढ़ें तो लाइक्स, शेयर से ज्यादा ये ध्यान रखें कि लिखने वाला कौन है.

क्या उसकी प्रोफाइल दी गयी है? कहीं रिसर्च करने वाला है, वैज्ञानिक है, प्रोफेसर है, रिटायर्ड अधिकारी है, क्या है? जिन तथ्यों का उसने उल्लेख किया है क्या उसने इस बाबत सन्दर्भ (reference) दिये हैं?

पिछले साल की बात है Scroll.in पर मैंने एक आलेख पढ़ा. लेखक कोई अनवर अली खान नाम का है, इसके अलावा उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है.

बन्दा लिखता है कि भारत में सेना ने तख्तापलट कभी इसलिए नहीं किया क्योंकि नेहरू और बाद की सरकारों ने लगातार सैन्य प्रतिष्ठानों की अनदेखी की, उनके मनोबल का ह्रास करने के हरसंभव प्रयास किये.

लेखक अपने तर्क को इस तरह से सही ठहराता है कि असैन्य नागरिक नियंत्रण की तुलना में सेना की स्थिति ज्यादा मजबूत होने से पाकिस्तान में कई बार तख्तापलट हुआ और अपनी सेना की निर्लज्जता से अवहेलना कर के नेहरू ने भारत में लोकतंत्र की रक्षा की.

यानि यदि हम सेनाओं का मनोबल गिराते हैं, तो हम लोकतंत्र के प्रहरी हैं.

1971 की विजय के बाद इंदिरा ने सशस्त्र सेनाओं को उपहार दिया और OROP व्यवस्था खत्म कर दी थी.

मजा देखिए कि जनाब अनवर अली खान ने अपना सारा निष्कर्ष Steven I Wilkinson की पुस्तक Army and Nation के introduction से निकाल लिया.

यानि एक किताब जो समग्रता में अध्ययन कर के लिखी गयी और जिसमें सेना के मुद्दे पर पटेल के साथ हुये नेहरू के मतभेदों का भी ज़िक्र है, सेना के आधुनिक इतिहास और बहुत सारी समस्याओं का अवलोकन है, उसमें से introduction में से एक section उठा के निष्कर्ष निकाल लिया.

क्योंकि मैंने ये बेहतरीन किताब पढ़ी है इसलिए मैं ये कह सकता हूँ कि कृपा कर के ऐसे लिखने वालों से बचिये. ऐसे लेखों को कभी लाइक शेयर न करें.

सेक्युलरई का ढोल पीटने वाले शिष्ट और बुजुर्ग पत्रकार असग़र वजाहत साहब को मैंने फ्रेंड लिस्ट से बाय-बाय कह दिया है.

एक हिलाल अहमद भी थे CSDS वाले जो NDTV पर बैठकर के रो रहे थे कि सच्चर मियां के अनुसार मालदा के मुसलमान अनपढ़ गंवार हैं.

मने अढ़ाई लाख अनपढ़ गंवार मियां ऐसे ही पिकनिक मनाने निकल आये और थाना फूंक दिए!!!

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