हंसी का पात्र बनने से बेहतर है गुणवत्तापूर्ण शोध कर लेना

मैसूर में आयोजित 103वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस 7 जनवरी 2016 को हुई थी. इस आयोजन की रूपरेखा और औचित्य पर 2015 की तरह इस साल भी विवाद हुआ था, जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रो० वेंकटरमण रामकृष्णन ने इसे महज़ एक सर्कस बता कर शामिल होने से मना कर दिया.

सम्मेलन के आरम्भ में ही पहले दिन 3 जनवरी को प्रधानमंत्री अचानक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक संस्था विज्ञान भारती को वो पुरस्कार प्रदान किये बिना ही चले गए जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने देने की घोषणा की थी.

खबर ये भी है कि विज्ञान कांग्रेस में शंख बजाया गया और कहा गया कि शंख बजाने से बाल काले होते हैं. इतना ही नहीं एक आईएएस अधिकारी भगवान् शिव को सबसे बड़ा पर्यावरणविद् बताने के उद्देश्य से पेपर पढ़ने वाले थे लेकिन दुर्घटनावश सम्मिलित नहीं हो सके.

आपको याद होगा कि साल 2015 की 102वीं विज्ञान कांग्रेस का भी उपहास किया गया था क्योंकि उसमें शिवकर बापूजी तलपड़े के वैमानिक शास्त्र पर एक शोध पत्र पढ़ा गया था. इस साल भी यही कहा जा रहा है कि विज्ञान कांग्रेस और संस्थान ‘संघ’ की बपौती बनते जा रहे हैं.

सवाल ये है कि इन सब घटनाक्रम से हासिल क्या हुआ. सबसे पहले प्रो० रामकृष्णन की बात करते हैं. भारत में पैदा हुए और स्नातक की पढ़ाई यहीं से करने वाले प्रो० रामकृष्णन को 2009 में नोबेल मिला था. मूल रूप से वे कैंब्रिज में रासायनिक जीव विज्ञान के क्षेत्र में काम करते हैं.

महत्वपूर्ण ये है कि इस समय वे रॉयल सोसाइटी के अध्यक्ष भी हैं. रॉयल सोसाइटी विज्ञान के क्षेत्र में विश्व की सबसे ताकतवर संस्थाओं में से एक है और पहली बार 1841 में आर्दाशिर करसटजी से ले कर अब तक अनगिनत नामी गिरामी भारतीयों को रॉयल सोसाइटी की फ़ेलोशिप से नवाज़ा जा चुका है.

उल्लेखनीय है कि प्रो० रामाकृष्णन रॉयल सोसाइटी के पहले भारतीय मूल के अध्यक्ष हैं. लेकिन साइंस कांग्रेस के बारे में उन्होंने यहां तक कह दिया कि, “(the ISC is) an organization where very little science is discussed. I will never attend a science congress again in my life.”

प्रो० रामाकृष्णन के इस कथन से कई बातें सामने आती हैं. ये कड़वा सच है कि हम बहुत सारी प्राचीन वैज्ञानिक पद्धतियों को प्रत्यक्ष दिखा कर प्रमाणित नहीं कर सकते. इसका बहुत बड़ा कारण ये है कि बहुत सारे ग्रन्थ और ज्ञान के भण्डार विदेशी हमलावरों द्वारा या तो नष्ट किये जा चुके हैं या अपने मूल स्वरूप में उपलब्ध नहीं हैं.

इसलिए विज्ञान कांग्रेस में तलपड़े के विमान का ज़िक्र कर के हंसी का पात्र बनने और शंख बजाने से अच्छा है कि हमारे हर केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालय में विदेशी विश्वविद्यालयों की तरह History of Science और Philosophy of Science के अलग विभाग हों जिनमें गुणवत्तापूर्ण शोध हो.

इन विषयों पर अलग conference कराये जाएँ और एक दूरदर्शी नीति के तहत जनमानस में इन बातों का समुचित तरीके से प्रचार हो. विश्व आज योग दिवस ऐसे ही नहीं मना रहा है, स्वामी रामदेव सहित उनके पहले के लोगों ने भी बाहर जा कर प्रचार किया, योग को घर-घर पहुंचाया; योग से प्रत्यक्ष फायदा मिलता हुआ दिखाई दिया तब जा कर संयुक्त राष्ट्र में स्वीकृति मिली.

प्रो० जयंत नार्लीकर ने कहते हैं कि ब्रह्माण्ड को समझने के लिये बिग बैंग थ्योरी ही एकमात्र सिद्धांत नहीं है लेकिन इसका प्रचार और मार्केटिंग अच्छी की गयी इसलिए ये इतनी प्रचलित है.

आज के समय में विज्ञान कांग्रेस जैसे आयोजन का औचित्य क्या होना चाहिए इसे प्रो० रामकृष्णन के कद से भी समझा जा सकता है. रॉयल सोसाइटी ने 2010 में ‘विज्ञान राजनय’ या Science Diplomacy पर एक पेपर प्रकाशित किया था जिसका उल्लेख आज हर जगह किया जाता है.

ये पेपर उन अधिकारियों को पढ़ना चाहिए जो प्रधानमंत्री की विदेश यात्रायें नियोजित करते हैं. हम प्रो० रामकृष्णन की नजर में हंसी का पात्र बनने की बजाए उन्हें विज्ञान राजनय के सन्दर्भ में महत्व देने का काम कर सकते थे क्योंकि आज वे रॉयल सोसाइटी के अध्यक्ष हैं.

हमारे देश में एक भ्रान्ति है कि नेहरू ने आधुनिक विज्ञान में शोध की आधारशिला रखी. जबकि सच्चाई ये है कि जब नेहरू गांधी अंग्रेजों के साथ राजनीति में व्यस्त थे तब बंगाल में वैज्ञानिक पुनर्जागरण के प्रणेता बन कर उभरे थे डॉ० श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के पिता सर आशुतोष मुख़र्जी जिन्होंने पहली बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस का आयोजन कराया था.

दक्षिण में चन्द्रशेखर वेंकट रमन सहित आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र रे, जगदीश चन्द्र बसु, सत्येंद्र नाथ बोस आदि का मानना था कि अगर सब लोग क्रांतिकारी हो जायेंगे तो स्वतन्त्र भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कौन करेगा जो कि आर्थिक उन्नति के लिए अनिवार्य है.

होमी भाभा, विक्रम साराभाई जैसे महान वैज्ञानिकों के बिना नेहरू कुछ नहीं कर सकते थे. नेहरू के गुण आज भी विदेशी वैज्ञानिक भी गाते हैं जब वे भारत के बारे में बोलते हैं. जब तक इस मानसिकता को जड़ से मिटाया नहीं जायेगा तब तक वैज्ञानिक प्रगति को राष्ट्रप्रेम का आधार नहीं मिलेगा.

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