इस्लाम आज तक क्यों पैदा न कर सका एक भी बुद्ध और महावीर?

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पता नहीं इस्लाम में कोई manufacturing fault है या इस्लाम कि वो अच्छाईयां आज तक सामने आकर जन जन में प्रभावी नहीं हो पाई जो प्रेम, करुणा, दया का सन्देश देती हैं.

क्या कारण है कि इस्लाम आज तक एक भी बुद्ध और महावीर पैदा न कर सका, जो बताते कि करुणा ही धर्म है… प्रेम ही ईश्वर है….

सोचना होगा कि इश्क मजाजी से इश्क हकीकी यानी प्रेमिका के लौकिक शरीर में अलौकिक को देखने का उपदेश देने वाली इस्लाम कि महान सूफी परम्परा भी अब अपने अस्तित्व की लड़ाई ही लड़ रही है… कबीर जैसे महान संत तो कभी समझ में आये ही नहीं.

क्या कारण है कि अधिकतर मुसलमान ये आसानी से समझ जाता है कि ‘इस्लाम खतरे में है..’ लेकिन मनुष्यता और इंसानियत का ख्याल भी मन में नहीं आता.

क्या कारण है कि अशफाक, अब्दुल हमीद और अब्दुल कलाम कभी मुसलमान युवाओं के यूथ आइकॉन नहीं हो पाते. वो एक आतंकवादी याकूब के नमाज ए जनाजा में लाखों की संख्या में उपस्थित होते हैं.

सोचना होगा मित्रों, शायद आपका सैकड़ों सालों से ब्रेन वाश किया जाता रहा है. इसलिए कट्टरता, नफरत, घृणा और हिंसा के बीज कहीं गहरे जाकर जड़ें जमा चुके हैं.

आज लादेन और बगदादी में असली हीरो नज़र आता है… बकरे की गर्दन और आदमी की गर्दन में क्या अंतर है लोग भूलते जा रहें हैं… रही सही कसर सो कॉल्ड सेक्युलरिज्म और तुष्टिकरण की राजनीति का धंधा करने वाले कुछ राजनीतिज्ञों ने कर दिया है. ये कभी नहीं चाहेंगे कि मुसलमान अमन चैन से रहें वरना इनकी पॉलिटिक्स का क्या होगा.

आज हालात भयावह हो गये हैं…

हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता ये सच है लेकिन आजकल हर आतंकवादी मुसलमान होता है ये भी उतना ही सच है. इससे बड़ी दुःख की बात कोई नहीं कि हजारों महान विभूतियों को पैदा करने वाला ये मजहब अब आतंकवाद और हिंसा का पर्याय होता जा रहा है.

इस हालात में उन अमन पसन्द बुद्धिजीवी युवा मुसलमानों को आगे आना चाहिए और एक मंच पर एकजुट होकर कट्टरता और जाहिलियत के खिलाफ जंग छेड़नी चाहिए क्योंकि घर का कोई सदस्य बिगड़ जाये तो उसे बाहरी नहीं घर वाले ही सुधार सकतें हैं.

इससे पहले कि देर हो जाए, आगे आकर भटक रहे मुस्लिम युवाओं को बताएं कि वो मुसलमान से पहले इंसान बन जाएँ. वो जानें कि कुरआन से ज्यादा महत्वपूर्ण इंसान है. प्रेम ही अल्लाह है. मनुष्यता से बड़ा कोई मजहब नहीं. लादेन बगदादी नहीं, कलाम जैसे लोग हमारे हीरो हैं. वरना मित्र समय माफ़ नहीं करेगा आपको.

आप ही कहतें हैं कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता. कल पेशावर में सैकड़ों मासूम मारे गए, आज पेरिस में मारे गए फिर कल क्या पता पटियाला में मारे जाएँ, मरेगा कोई हमारा आपका ही लाचार मासूम और बेगुनाह.

आज प्रिय साहिर याद आ रहें हैं बहुत…

“ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में
अमने आलम का ख़ून है आख़िर

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है

टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है

इसलिए ऐ शरीफ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है.”

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