नादिरशाह और सलार मसूद जैसों के लिए उर्स के मेले लगाने वाले सहिष्णु लोग हैं हम

सोमनाथ पर महमूद गजनवी के हमले के बारे में शायद सब जानते हैं। 1026 AD में हुए इस हमले में महमूद गजनवी के साथ जो लोग आये थे उनमें उसका 11 साल का भतीजा सलार महमूद भी था। गज़नवी जब लूट के माल के साथ लौटा तो उसका ये भतीजा दक्षिण एशिया में अपनी खून और लूट की प्यास बुझाने के लिए रुका रहा।

बाद में 1031 AD में अपने दो जनरल मेरे हुसैन अरब और अमीर वाजिद जफ़र के साथ करीब 50,000 घुड़सवारों और करीब एक लाख की फौज के साथ इसने दोबारा हमला किया।

इसके चाचा सलार सैफुद्दीन, मीर बख्तिआर, मीर सय्यद अजीजुद्दीन, और मलिक बहरुद्दीन भी अपनी अपनी फौजी टुकड़ियों के साथ इस से आ मिले। उत्तर भारत में तेज़ हमले करता ये मेरठ, कन्नौज और मलीहाबाद से होता सतरिख आ पहुंचा।

मेरठ और उज्जैन के स्थानीय राजाओं ने इस से संधि कर ली। फिर साकेत जीत लिया गया। मिया रजब और सलार सैफुदीन ने बहरैच जीत लिया। आमिर हसन ने महोना पर तो मालिक फज़ल ने वाराणसी पर हमला कर दिया।

सुलुतानु सलातीन और मीर बख्तियार दक्षिण में कन्नोर के तरफ बढे लेकिन वहां मीर बख्तियार स्थानीय सेनाओं से लड़ाई में मारा गया। सय्यद साहू ने कर्रा और मानिकपुर जीत लिया, मलिक अब्दुल्लाह को कर्रा में और क़ुतुब हैदर को मानिकपुर में छोड़ कर सय्यद अज़ीज़उद्दीन को हरदोई की तरफ भेजा गया लेकिन वो गोपमाऊ की लड़ाई में गोमती के किनारे ही मारा गया। इसकी कब्र और इसके करीबी जलालुद्दीन बुखारी और सय्यद इब्राहीम बार हजारी कीकब्रें अभी भी रेवारी में हैं।

सय्यद सलार मसूद अयोध्या पर हमला करने के इरादे से जैदपुर, रुदौली के रास्ते आगे बढ़ा। लेकिन रौनाही पहुँच कर उसका इरादा बदल गया और सलार मसूद की बसाई सलारपुर अभी भी अयोध्या के बाहर ही है।

उसने फ़ौज के साथ ब्रह्मर्ची की तरफ कूच किया, आज उत्तर प्रदेश की ये जगह बहरैच (बहराइच) नाम से जानी जाती है। उस ज़माने में यहाँ एक सूर्य मंदिर था जिसे बालार्क मंदिर कहते थे, एक बावली और एक सूर्य कुंड भी हुआ करता था। टूटी फूटी सी हालत में बावली आज भी है। इस हमले के समय पासी राजा इस इलाके पर राज्य करते थे।

जी, बिलकुल सही पढ़ा। ‘पासी’ भी, और ‘राजा’ भी!

सलार मसूद के हमले के वक्त लक्ष्मीपुर, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव, फैजाबाद, बहरैच, श्रावस्ती, और गोंड के इलाके पर पासी शासक थे जिनके सरदार थे राजा सुहेलदेव। उनके निर्देश में 21 पासी राजा इस इलाक़े पर राज करते थे।

  1. राज साहेब, 2. अर्जुन, 3. भग्गन, 4. राय रैब, 5. गंग, 6. मकरन, 7. शंकर, 8. करण, 9. बीरबल, 10. जयपाल, 11. श्रीपाल, 12. हरपाल, 13. हरकरण, 14. हरखू, 15. नरहर, 16. भल्लार, 17. जुधारी, 18. नारायण, 19. दल, 20. नरसिंह, 21. कल्याण

दरअसल सतरिख में ही सलार मसूद को दोस्त मुहम्मद का संदेशा मिल गया था। वो धुन्धगढ़ के किले को घेरने की कोशिश में बुरी तरह घेर लिया गया था। आखिर मसूद को अपने धर्म गुरु सैय्यद इब्राहीम मशहदी बारह हजारी को उसको बचाने भेजना पड़ा।

आईने-मसूदी में लिखे को मानें तो जिस तरफ का रुख सैय्यद इब्राहीम मशहदी बारह हजारी करता था वहां कोई काफ़िर बच नहीं सकता था। बचने की एक ही शर्त थी इस्लाम कबूलो या फिर मरो!

धुन्धगढ़ के किले की लड़ाई में और कई ऐसे ही सेनानायको के साथ ये भी मार दिया गया। इसकी कब्र कोट कासिम में हैं, रेवारी के नजदीक अलवर में, तिजारा से करीब बीस पच्चीस किलोमीटर दूर।

इधर सलार सैफुद्दीन को बहरैच के पास घेर लिया गया था और सलार मसूद को अपनी बढ़त रोकनी पड़ी। वापिस उत्तर की तरफ घूम कर वो बहरैच की तरफ बढ़ा। पासी सरदार तब तक भकला नदी के तट पर जमा हो चुके थे। पासी राजाओं ने राजा सुहेलदेव की कमान में लड़ने का फैसला किया। दोनों फौजें चित्तौरा झील पर टकराई। आज के बहरैच से करीब आठ किलोमीटर दूर बहरैच-गोंडा रोड पर स्थित है ये जगह।

दोनों फौजें 13 जून 1033 को टकराईं। इस्लामिक फौज़ का दाहिना हिस्सा मीर नसरुल्लाह के मारे जाते ही टूटने लगा। थोड़ी ही देर में सलार मिया रजाब भी मार गिराया गया। आखिर में राजा सुहेलदेव ने सलार मसूद का सर काट लिया।

अपनी इस जीत के उपलक्ष्य में श्रावस्ती के आस पास कई बावड़ियाँ बनवाई। मीर नसरुल्लाह की कब्र बहरैच से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर खुर्द में है। बहरैच से ही तीन किलोमीटर दूर ‘हठीला पीर’ नाम से सलार मिया रजाब की कब्र भी शाहपुर जोत युसूफ नाम के गाँव में है।

इस जीत के साथ ही पासी राजा सुहेलदेव की सेना ने इस्लामिक फौज का लगभग सफाया कर डाला था। दो लाख सिपाहियों में से शायद ही 5 – 10 हज़ार बचे हों।

करीब सौ साल तक मुस्लिम सेनाओं ने फिर भारत का रुख नहीं किया। इन सौ सालों में ‘गाज़ी बाबा’ और ‘शहीदों’ के नाम से इस युद्ध में मारे गए मुसलमानों की कीर्ति फ़ैल चुकी थी। मई के अंत में अब यहाँ उर्स होता है ‘बड़े मियां’ या ‘गाज़ी मियां’ के उर्स के नाम से लगने वाला ये मेला तीर्थ सा बन गया है |

सुल्तान फ़िरोज़शाह तुगलक सलार मसूद का बड़ा प्रशंसक था। उसकी कब्र पर मज़ार उसी ने बनवाई थी। यहाँ पर सलार मसूद के ज़माने के कई हथियार भी दिखाने के लिए रखे मिलेंगे।

हमलावरों के महिमामंडन, और देश बचाने वालों को ‘असहिष्णु’ कहने वालों के देश में आपका स्वागत है। कोई पूछता था कि क्या दिल्ली नादिर शाह की जयंती मनाएगी? तो ये लेख उसके जवाब में है!

जनाब हम नादिरशाह और सलार मसूद जैसों के लिए उर्स के मेले तो पहले से लगाने वाले सहिष्णु लोग हैं!

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