Digital India : हंसी खेल नहीं है वैज्ञानिक शोध, अपनाना ही होगी Science Diplomacy

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी बहुआयामी परियोजना डिजिटल इंडिया के समर्थन में अमेरिका के सिलिकॉन वैली से देश को कितना लाभान्वित कर पाते हैं यह समय के गर्भ में है. इस परिप्रेक्ष्य में इस पर विचार करना जरुरी है कि हम दुनिया को क्या दे सकते है और दुनिया हमसे क्या ले सकती है.

हम अभी दूसरे देशों से जो सहयोग लेते हैं या अपेक्षा रखते हैं वो टुकड़ों में किया जाने वाला काम है. इसे बड़े राजनयिक स्तर पर ले जाने की जरुरत है. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में Diplomacy या राजनय का बड़ा महत्व है.

राजनयिक संबंध कई प्रकार से बनाये जाते हैं. आर्थिक, राजनीतिक, द्विपक्षीय, बहुपक्षीय, सामरिक आदि. इसमें एक नया आयाम जुड़ा है विज्ञान राजनय या Science Diplomacy. ब्रिटेन की वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी, रसूखदार और विश्वप्रसिद्ध संस्था The Royal Society ने Science Diplomacy नामक विषय पर 2010 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की.

इस रिपोर्ट में 3 बिंदु सुझाए गए हैं: पहला, Science in Diplomacy जिसमें बताया गया है कि विदेश नीति के लक्ष्य तय करते समय वैज्ञानिक सलाह ली जाए. दूसरा, Diplomacy for Science जिसका मतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों के मध्य सहभागिता सहज की जाये और तीसरा ये कि इस सहभागिता का लाभ ले कर देशों के बीच राजनयिक संबंध प्रगाढ़ किये जाएँ. इसे Science for Diplomacy कहा गया.

इस रिपोर्ट में Science Diplomacy का संक्षिप्त इतिहास भी बताया गया है. राजनीति शास्त्र के विद्वान भारत को राष्ट्र-राज्य नहीं मानते. उनका कहना है भारत में अनेक विभाजित सभ्यताएं हैं जिनका आपस में घर्षण राष्ट्र के रूप में एकरूपता सुनिश्चचित नहीं करता. वे जो कुछ भी कहें लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप की भूमि ऐतिहासिक रूप से एक ही वैज्ञानिक विरासत संजोये हुए है.

भारत में विज्ञान का इतिहास बहुत पुराना है. यदि सूक्ष्म दृष्टि डालें तो भारत अपने आप में एक महान वैज्ञानिक संस्कृति है. पुराणों और वेदों में भी कोई भी बात अवैज्ञानिक नहीं कही गई. साइबर तकनीक और मूलभूत विज्ञान भी पृथक विषय नहीं हैं.

जब Tim Berners Lee ने World Wide Web का अविष्कार किया था तो ये विश्व में विज्ञान की सबसे बड़ी भौतिक प्रयोगशाला में हुआ था जिसका नाम CERN है. इसी विशाल प्रयोगशाला की Large Hadron Collider नामक मशीन में पदार्थ के मूलभूत कणों की खोज जारी है.

इसी परिसर में भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा दी गई भगवान नटराज की विशाल प्रतिमा भी स्थापित की गई है. नटराज की परिकल्पना पदार्थ के मूल कणों द्वारा Cosmic Dance के रूप में की गई है. जिसे God Particle कहा गया है. उसका वैज्ञानिक नाम Higgs Boson है क्योंकि सैद्धांतिक रूप से इसकी खोज Peter Higgs ने की थी और ये Boson कण प्रो० सत्येन्द्रनाथ बोस के नाम पर हैं जिन्होंने प्रो० Albert Einstein के साथ मिल कर पहली बार इन कणों की सांख्यिकी विकसित की थी.

सत्येन्द्रनाथ बोस आज़ादी से पहले जर्मनी गए थे और उन वैज्ञानिकों के सानिध्य में उन्होंने काम किया था जिन्होंने आधुनिक वैश्विक तकनीकीकरण की नींव रखी थी. महत्वपूर्ण ये भी है कि भारत में कभी वैज्ञानिक इतिहास लेखन की परंपरा नहीं रही. हम सिर्फ राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास पर ही विमर्श करते हैं और इसी लड़ाई में कोई मार्क्सवादी हो जाता है तो कोई साम्प्रदायिक.

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी ने History of Science Board का गठन 1958 में किया और 1967 में National Commission for the Compilation of History of Sciences in India गठित किया गया जिसका नाम बदल कर 1989 में Indian National Commission for History of Science कर दिया गया.

इस आयोग ने एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की जिसका सम्पादन डॉ० देबेन्द्र मोहन बोस ने किया. इसका नाम A Concise History of Science in India. इस किताब में वैदिक काल से ले कर उन्नीसवीं सदी तक के काल खंड में भारत की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत का लेखा जोखा है.

जरुरत है कि हम अपनी इस विरासत को समझें और इस दिशा में सतत उद्यम करें. इस देश में कार्य करने की वैज्ञानिक संस्कृति विकसित करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिये. या यों कहें कि सदियों से सुषुप्त संस्कृति को जगाने की जरुरत है. हम सिर्फ आर्यभट, वाराहमिहिर और रमन के नाम से ही संतुष्ट हो जाते हैं.

हमने हमेशा खेल-खेल में विज्ञान सीखने की कोशिश की है. दूरदर्शन पर भी हमेशा मनोरंजक प्रोग्राम आते थे जो खेल दिखाकर विज्ञान सिखाते थे. स्कूल में निबंध लिखने को आता था कि विज्ञान- वरदान या अभिशाप. जबकि विज्ञान न तो खेल है न जादू, न वरदान न अभिशाप. विज्ञान एक फ्रेमवर्क है जो अन्य सभी विद्याओं की आधारभूत संरचना को समेटे हुए है.

हमारा शास्त्रीय संगीत हो या संस्कृत भाषा का व्याकरण, सारी विधाएं इसी वैज्ञानिक फ्रेमवर्क के अंतर्गत रची और विकसित की गईं हैं. मैडम मैरी क्यूरी को रेडियोधर्मिता की खोज करते हुए रेडिएशन जनित रोग हो गए थे. प्रो० सी० वी० रमन नोबेल पुरस्कार लेने गए तो मंच पर रो पड़े थे क्योंकि वे ग़ुलाम हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जब उन्होंने रमन इफेक्ट की खोज की थी तब उनके पास उपकरण खरीदने तक के पैसे नहीं थे.

वैज्ञानिक शोध हँसी खेल का काम नहीं है. हमारे देश में सरकार के अंतर्गत विज्ञान से सम्बंधित जितने भी विभाग हैं उनमे आपस में coordination नहीं है. हमारी तीन विज्ञान अकादमी, परमाणु ऊर्जा विभाग के शोध संस्थान, CSIR की प्रयोगशालाएं, बायोटेक्नोलॉजी विभाग आदि कितना कुछ है लेकिन आपस में समन्वय नहीं है. कोई शोधार्थी ये नहीं जान पाता की उसकी खोज के आगे क्या है. इससे दिशा भ्रम होना स्वाभाविक है.

डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के तहत एक राष्ट्रीय शोधार्थी पोर्टल बनना चाहिये जो रिसर्च को जोड़ सके. जहाँ शोधार्थी आपस में बात कर सकें, पेपर शेयर कर सकें. गवर्नेंस का ध्यान इस तरफ भी जाना चाहिये जब वैश्विक स्तर पर आज विज्ञान में शोध interdisciplinary हो चला है.

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शक्ति या Power की परिभाषा ऐसी क्षमता के रूप में दी जाती है जो किसी से वो काम करवा ले जो अन्यथा संभव न हो. सुरक्षा या Security शक्ति का कारक और कारण दोनों है. यदि हमें सुरक्षा चाहिये तो वैज्ञानिक उद्यम ही अंतिम विकल्प है क्योंकि यही हमारी संस्कृति है. हम तेल बेच कर सोने के टॉयलेट में जाने वालों में से नहीं हैं. DRDO का आदर्श वाक्य है: बलस्य मूलं विज्ञानं.

एक और महत्वपूर्ण बात. हम अपने शोध और गुणवत्ता की उचित ब्रांडिंग मार्केटिंग नहीं करते. विज्ञान पत्रकारिता हमारे यहाँ नगण्य है. सिर्फ CSIR-NISCAIR से प्रकाशित पत्रिकाएं विज्ञान प्रगति और Science Reporter ही दशकों से बिक रही हैं जो नवोन्मुख शोध प्रकाशित नहीं करतीं. अमरीका की Scientific American और New Scientist जैसी पत्रिकाएं दो सौ सालों से प्रसिद्ध हैं.

डिजिटल इंडिया के माध्यम से हम नई, शोधपरक और गुणवत्तापूर्ण ऑनलाइन पत्रिकाएं निकालें तो ये कदम आन्दोलनकारी साबित हो सकता है. हमारे शोध संस्थान और विश्वविद्यालय कोप भवन में कुछ खोज निकालते हैं और किसी को पता ही नहीं चलता. आप सोशल मीडिया के प्लेटफार्म फेसबुक या ट्विटर पर किसी भी अमरीकी विश्वविद्यालय का पेज देख सकते हैं लेकिन एक भी उत्कृष्ट भारतीय शोध संस्थान का कोई पेज या चर्चा तक नहीं होती.

एक बार प्रो० जयंत नार्लीकर ने कहा था की Big Bang थ्योरी इतनी प्रसिद्ध इसीलिए हुई क्योंकि उसकी मार्केटिंग बढ़िया तरीके से की गई थी. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर Thomson Reuters जैसी कम्पनियाँ रिसर्च की मॉनिटरिंग और रेटिंग का काम करती हैं.

जैसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के index को Sensex कहते हैं, उसी प्रकार वैज्ञानिकों की उत्पादन क्षमता का भी मानक होता है index होता है जैसे H-IIndex etc. वैज्ञानिक भी उत्पादन तब करेंगे जब recognition मिलेगा वरना वे भी उदासीनता का ही परिचय देंगे. इसके लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन की जरुरत है.

एक उदाहरण लीजिये. भारतीय विज्ञान संस्थान द्वारा स्कूल-कॉलेज के स्तर पर करायी जाने वाली एक प्रतियोगिता है किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना यानि KVPY. इस प्रतियोगिता में पहले एक मौका दिया जाता था कि युवा छात्र एक प्रोजेक्ट बना कर लायें. एक पैनल बैठता था और प्रोजेक्ट की गुणवत्ता के आधार पर छात्रवृत्ति दी जाती थी. कुछ साल पहले ये बंद कर दिया गया और पूरी तरह से परीक्षा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की होने लगी. अब इनकी भी प्राइवेट कोचिंग कराई जाती है.

गौरतलब है कि अमरीका में Google और Intel द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता कराई जाती है जिसमे कुछ रटे रटाये प्रश्न नहीं हल करने होते बल्कि अपनी मेधा का प्रमाण कोई innovative प्रोजेक्ट बना कर ही देना होता है. जो विजयी होता है उसे टॉप के विश्वविद्यालय में पूरी पढ़ाई का खर्चा और बहुत कुछ दिया जाता है जिसकी कल्पना भी भारतीय छात्र नहीं कर सकते.

इसके अलावा जितने भी अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान या प्रयोगशालाएं हैं जैसे International Thermonuclear Energy Reactor, CERN, Global Research Council आदि जहाँ कई देश मिल कर शोध करते हैं उनमें हमारा प्रतिनिधित्व उदासीन है या नगण्य है. यदि हमें तेज़ी से बदलते विश्व के साथ निर्णायक भूमिका निभानी है तो Science Diplomacy के बारे में गंभीरता से सोचना होगा.

साथ ही संस्थानों के स्तर पर समन्वय और नवोन्मेषी विचारपरक, राजनैतिक पूर्वाग्रहों से रहित, उद्यमशील समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की समरसता निर्मित करनी ही होगी.

अन्यथा हम अपनी महान वैज्ञानिक संस्कृति के साथ छल करेंगे और हजारों वर्षों तक दूसरे का मुँह ताकते रहेंगे. वैज्ञानिक शोध हंसी खेल नहीं है.

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