‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’, महान संदेशों को केवल दोहराएं नहीं, जियें भी

शहीद भगत सिंह का जन्मदिन 27 सितम्बर को था. इसे भी हम लोगों ने उसी तरह मनाया जैसे आमतौर पर हम अपने देश के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों का मनाते आये है. कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ ने उनके चरणों में अपने श्रृद्धा-सुमन चढ़ाये, कुछ ने गाँधी-नेहरु को उनकी फांसी की सज़ा ना रूकवाने के लिए गाली दी, तो कुछ ने “हम ना हुए” के अंदाज़ में अफ़सोस भी जताया.

इन सबके बीच मैं एक सोच में पड़ गया. भारतवर्ष का नागरिक किसी भी धर्म का हो, उंचा-नीचा, स्वर्ण, दलित या महादलित हो, हिंदू, मुसलमान या सिख, इसाई हो, पढ़ा-लिखा या अनपढ़ हो, कोई किसी बात को जाने या ना जाने, परन्तु वह गीता के इस श्लोक से अवश्य परिचित है “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः||”

और अगर इसे संस्कृत में ना पढ़ सके तो भी इसके हिंदी अर्थ को तो अवश्य जानता है “इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता।“

भारत में बहुत से लोग आत्मा या परमात्मा से अस्तित्व को नहीं मानते. परन्तु अधिकाँश लोग इस श्लोक को अवश्य मानते है. और तनिक भी अवसर पाते ही इस श्लोक को दुहराने लगते है. अधिकांश भारतीय के लिए जीवन पहला या अंतिम जीवन नहीं होता बल्कि अनगिनत जीवन के बीच एक जीवन होता है. यह भारतीयों की अखंड, अडिग धारणा है.

किन्तु अति विचित्र बात तो यह है कि शरीर खत्म होने से हम नहीं खत्म होते – मानने वाले भारतीय 1000 वर्षो तक गुलाम रहे. अगर लड़ाई हार कर गुलाम हो गए तब भी कोई बड़ी बात नहीं होती, परन्तु यह तो बहुत बड़ी बात है कि आत्मा के अमरत्व में तथा शरीर को मरणा-धर्मा मानने मानने वाले भारतीय, 850 वर्ष तक विदेशी आक्रान्ता के विरुद्ध कोई भी बड़ी लड़ाई भी नहीं लड़ें.

1857 में पहली बार यह देश शरीर से ऊपर उठ कर अन्याय और विदेशी शासन के विरुद्ध उठ खडा हुआ. अगर देश के एक भाग ने भी उपरोक्त श्लोक को जिया होता, तो यह देश गुलाम कैसे हो जाता? अगर देश के एक भाग ने भी उपरोक्त श्लोक को जिया होता, देश के ऊपर जान को देने वालों की फ़ौज खड़ी हो जाती. अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए मैं दो-एक उदाहरण दूंगा.

राजगुरु का बूढ़े वार्डन से मज़ाक

राजगुरु को फांसी होने वाली थी. फांसी की पूर्व संध्या पर एक बूढ़ा वार्डन राजगुरु के पास एक आम लेकर आया और बोला “बेटा, अब मैं क्या करूं, मेरे पास यही एक आम है. कोई आग्रह नहीं है क्योंकि हो सकता है कि तुम्हरा मन ना भी करे. फिर भी यदि मन करे तो इसे खा लेना, इसे चूस लेना.” ऐसा कह कर वह बूढ़ा वार्डन आम उसी जगह रहकर चला गया.

सुबह राजगुरु को फांसी होने के बाद जब वह वार्डन राजगुरु के कोठरी साफ़ करने आया तब उसने देखा कि वह आम ज्यों का त्यों रखा हुआ है. यह सोचते हुए कि मौत से पहले आम खाने का मन किसको करता है – जब उस वार्डन ने वह आम उठाया तब क्या देखता है कि राजगुरु ने वह पूरा आम चूस लिया था और उसमें दुबारा हवा भरकर उसको ज्यों का त्यों बनाते हुए उस बूढ़े वार्डन से एक मज़ाक सा किया था.

क्या कोई सोच भी सकता है कि कोई व्यक्ति, वह भी मात्र 23 वर्षीय युवक जिसने अभी दुनिया भी नहीं देखी है, मौत में भी खिलवाड़ करे और हंसते-हंसाते फांसी पर चढ़ते हुए, फांसी को केवल मज़ाक मानते हुए वार्डन से खेल करे.

तनिक गौर कीजिये : यही वह व्यक्ति है जिसने कभी गीता नहीं पढ़ी, परन्तु जो बिना सिद्धांत जानते हुए आत्मा की अमरता पर विश्वास करता था. कृष्ण ने इसी व्यक्ति के लिए कहा था “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः||” मेरे जैसे के लिए नहीं.

भगत सिंह जानते थे गीता का मर्म

दूसरा उदाहरण भगत सिंह का स्वयं है. भगत सिंह तो नास्तिक थे. शायद उन्होंने अपने हाथ में गीता उठाई भी ना हो. परन्तु जब लोग उनको फांसी के लिए लेने आये तो वह एक किताब पढ़ रहे थे. चलने से पहले भगत सिंह ने उस किताब के पन्ने का कोना मोड़ कर इस तरह निशान लगाया जैसे वापस आ कर फिर से किताब पढना शुरू करेंगे. इस नास्तिक को पता था कि “इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता.“

अगर हमारे देश ने लफ्फाजी छोड़ कर इन शब्दों को जिया होता जैसे कि भगत सिंह और राजगुरु जीते थे तो दुनिया में किसी कि मजाल भी ना होती कि वह भारत की ओर देख भी लेता, गुलाम बनाना तो बहुत दूर की बात थी.

इस लेख का उद्देश्य शहीद भगत सिंह और सभी शहीदों के चरणों में नमन करना तो है ही, साथ ही यह सन्देश देना भी है कि महान संदेशों को केवल दोहराएं नहीं बल्कि उनको जियें भी.

प्रदीप शंकर

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