मिशनरियों का विरोध किया तो क्या कर सकता है अमेरिका?

संसार में कहीं भी अपने मिशनरी अबाधित धर्मांतरण कर सके इसलिए अमेरिकन सरकार ने 1998 में एक कानून बनाया है। नाम है International Religious Freedom Act of 1998.

इस कानून द्वारा यह महासत्ता हर देश से यह अपेक्षा रखती है कि उनके मिशनरियों को वहाँ धर्मप्रसार करने की खुली छूट मिले। जहां भी अमेरिकन ईसाई मिशनरी जाएँ, वहाँ उनका स्वागत होना चाहिए। और वे जो चाहे करें उसमें उक्त देश कोई भी बाधा या रुकावट न डालें यह भी अपेक्षा है।

अगर कोई देश अमेरिकन मिशरियों को धर्मप्रसार से रोकता है तो यह कानून अमेरिकन प्रेसिडेंट से कार्रवाई की मांग करता है। यह कार्रवाई क्या हो सकती है यह मूल से ही पढ़ना उचित होगा। इस एक्ट की लिंक दे ही रहा हूँ और साथ साथ उसके संक्षिप्त वर्णन की Wiki भी दे रहा हूँ। अगर आप को पूरा एक्ट नहीं पढ़ना या नहीं ढूँढना तो जो कार्रवाई के 15 प्रावधान हैं वे भी अंत में दे रहा हूँ।

कार्रवाई क्या हो सकती है वो तो लिस्ट नीचे दी ही है, लेकिन झलक के तौर पर एक प्रस्तुति : धौंस से ले कर आर्थिक तरीकों से गला घोंटने तक पूरा प्रावधान है।

मिसाल पेश है : आर्थिक मदद देने से इन्कार करना, इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट बंद करना, उक्त देश के उद्योगों का क्रेडिट बंद करना, उक्त देश के माल-सामान को इन्शुरेंस से वंचित रखना, संरक्षण अंतर्गत सभी सहायता से वंचित रखना, शस्त्र की सप्लाई रोकना (सवाल : इनसे M 777 तोपें लेना क्या उचित होगा?), परमाणु कार्यक्रम के लिए सहायता नहीं, (कोई और देता हो तो उसे भी रोकने की कोशिश जायज़), उस देश के साथ व्यापार बंद।

मल्टीनेशनल कंपनियों को भी इस एक्ट का उपयोग कर के सहकार्य करने के निर्देश हैं।

क्या यह केवल हिंदुओं के खिलाफ है? भाई मेरे, हम अपने देश की बात कर रहे हैं। और यहाँ तो इस कानून का कवच पहन कर मिशनरी हमारे सामने अट्टहास करें तो क्या भारत के हिन्दू इसे अपने विरुद्ध षडयंत्र न समझे? बाकी इनके जो कारनामे होते हैं उस पर भी और लेख लिखूंगा कि कैसे सुनियोजित तरीके से हिन्दू संख्या को क़तर रहे हैं।

युद्ध सिर्फ सेनाओं के बीच नहीं होता, और हर युद्ध का आर्थिक पैमाना होता ही है। युद्ध लड़ने के लिए अंतत: धन तो चाहिए ही। जिसका आर्थिक बल खत्म किया जाये वो बिना कोई वास्तविक युद्ध से पहले ही हार जाता है। आज भारत और अमेरिका के बीच जो संबंध हैं उनका आर्थिक पर्याय भारत के पास नहीं है। अगर अमेरिका ये सभी निर्बंध लागू कर दे तो भारत की हालत खराब हो जाएगी।

लेकिन क्या इसका मतलब ये होगा कि हम अपने धर्म को मिटते बस देखते रहें? मुझे गारंटी है कि आप में से विरले ही किसी को इस कानून के बारे में मालूमात होगी, यह आलेख पढ़ने के पहले। लेकिन अब मालूम हो गया है तो सिर्फ हाथ पर हाथ धरे बैठने से नहीं चलेगा।

क्या कर सकते हैं हम और आप?

हतबल न हों! मैं आप से एक ही सवाल पूछूंगा, कि क्या कर सकते थे हमारे माँ-बाप / या उनके माँ बाप जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़े?

सच पूछें तो वो एक लड़ाई थी जिसमें बहुत ही कम लोग वास्तव में लड़े। उस लड़ाई का आर्थिक परिमाण समझा था एक बनिया। जी, गांधी जी। आज शायद वही आर्थिक परिमाण और असहकार का पुनर्विचार करना होगा अगर यह धर्म पर आये संकट से देश को बचाना है।

आंदोलन भी आवश्यक होगा जिससे अमेरिकन सरकार को ये बताया जाये कि भारत की जनता इस कानून को देश की सार्वभौमिकता पर अतिक्रमण मानती है। सच तो आम अमेरिकन जनता को भी यह पता नहीं होगा कि उनकी सरकार ने ऐसा कानून बनाया भी है। ऐसे कानून का वे भी समर्थन नहीं करेंगे। अमेरिका स्थित हिंदुओं को भी अपने अमेरिकन मित्रों में जनजागृति करनी होगी। अमेरिकन लोग भी हमारे जैसे ही लोग हैं। बात समझ जाएँगे अगर ठीक से समझाएं तो।

हाँ, और एक बात है, वहाँ प्रेसिडेंट को अगर लगे कि एक्शन से अमेरिका का अहित होगा तो ऐसे देश के सामने कोई भी कदम न उठाने के भी अधिकार हैं। सऊदी जैसे मुस्लिम देश, चाइना जैसे देशों को अमेरिकन प्रेसिडेंट धार्मिक सहिष्णुता का लैक्चर देने की हिमाकत नहीं करते। उन्हें पता है क्यूँ ये हिमाकत नहीं होती।

आपको पता है, भारत को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हाथी की संज्ञा दी गयी है। जैसे चाइना को ड्रैगन कहा जाता है, भारत को हाथी। और हाथी के विषय में एक बात कही जाती है कि जब वो बच्चा होता है, उसे एक खूँटे से बांधा जाता है एक मज़बूत रस्सी से। न वो उस खूँटे को उखाड़ सकता है न उस रस्सी को तोड़ सकता है। जब वो बड़ा होता है तो भी उसे उसी खूँटे से बांधा जाता है। वास्तव में वो एक झटके से उस खूँटे को उखाड़ सकता है लेकिन उसके मन में वही बात बैठी है कि ये उस से नहीं हो पाएगा। लगता है हमारे साथ भी यही बात हुई है।

इस देश के नौजवान अगर सिर्फ अमेरिका के सपने देखना छोड़ किन्हीं और दिशाओं की भी सोचें, तो भी बहुत कुछ हो सकता है। मुद्दा है आर्थिक निर्भरता का। और इस काम में हम में से हर एक को अपनी अपनी भूमिका निभानी है। नहीं तो वो कथा याद है न? राजा ने शिवलिंग को दूध का अभिषेक करने की आज्ञा दी थी, लेकिन पाया केवल जल। क्यूंकी हर किसी ने यही सोचा कि दूध बाकी सब डालेंगे; मैं पानी चढ़ा दूँ तो किसे मालूम होना है?

बतौर सरकार के प्रमुख, प्रधानमंत्री मोदी की भी सीमाएँ हैं। जो भी करना है, हिंदुओं को भी निर्णय लेना होगा ।

इस नोट को शेयर कर के आप इस कार्य को चालना दे सकते हैं ।

International Religious Freedom Act of 1998 यहाँ डाउनलोड कर सकते हैं http://www.state.gov/documents/organization/2297.pdf

उसकी Summary यहाँ पढ़ सकते हैं : International Religious Freedom Act of 1998

आर्थिक निर्बंधों का प्रावधान कुछ इस कदर है (pp 20-21 H. R. 2431—20, 21)

Countries that are severe violators of religious freedom are categorized under Sec 402 of the Act and this subjects them to punitive sanctions which are listed in Sec. 405. Under this section, the president must either enter into a binding agreement with the concerned country to end the religious persecution, or to choose from remedies outlined in Sec. 405 of the Act. This section offers the president fifteen options to exercise against countries engaging in religious persecution. These include

SEC. 405. DESCRIPTION OF PRESIDENTIAL ACTIONS.

(a) DESCRIPTION OF PRESIDENTIAL ACTIONS.—Except as provided in subsection (d), the Presidential actions referred to in this subsection are the following:

(1) A private demarche.

(2) An official public demarche.

(3) A public condemnation.

(4) A public condemnation within one or more multilateral fora.

(5) The delay or cancellation of one or more scientific exchanges.

(6) The delay or cancellation of one or more cultural exchanges.

(7) The denial of one or more working, official, or state visits.

(8) The delay or cancellation of one or more working, official, or state visits.

(9) The withdrawal, limitation, or suspension of United States development assistance in accordance with section 116 of the Foreign Assistance Act of 1961.

(10) Directing the Export-Import Bank of the United States, the Overseas Private Investment Corporation, or the Trade and Development Agency not to approve the issuance of any (or a specified number of ) guarantees, insurance, extensions of credit, or participations in the extension of credit with respect to the specific government, agency, instrumentality, or official found or determined by the President to be responsible for violations under section 401 or 402.

(11) The withdrawal, limitation, or suspension of United States security assistance in accordance with section 502B of the Foreign Assistance Act of 1961.

(12) Consistent with section 701 of the International Financial Institutions Act of 1977, directing the United States executive directors of international financial institutions to oppose and vote against loans primarily benefiting the specific foreign government, agency, instrumentality, or official found or determined by the President to be responsible for violations under section 401 or 402.

(13) Ordering the heads of the appropriate United States agencies not to issue any (or a specified number of ) specific licenses, and not to grant any other specific authority (or a specified number of authorities), to export any goods or technology to the specific foreign government, agency, instrumentality, or official found or determined by the President to be responsible for violations under section 401 or 402, under—

(A) the Export Administration Act of 1979;

(B) the Arms Export Control Act;

(C) the Atomic Energy Act of 1954; or

(D) any other statute that requires the prior review

and approval of the United States Government as a condition for the export or re-export of goods or services.

(14) Prohibiting any United States financial institution from making loans or providing credits totaling more than $10,000,000 in any 12-month period to the specific foreign government, agency, instrumentality, or official found or determined by the President to be responsible for violations under section 401 or 402.

(15) Prohibiting the United States Government from procuring, or entering into any contract for the procurement of, any goods or services from the foreign government, entities, or officials found or determined by the President to be responsible for violations under section 401 or 402. Under Title IV, the president may waiver punitive measures against the concerned country. This would allow the president in balancing of the objectives of the bill with other US Foreign Policy interests. The Title V of the act seeks to promote religious freedom abroad through the way of international media, exchanges and foreign service awards for working to promote human rights. The Immigration and Naturalization Service officials are trained under the venues of Title VI of the Act.

The final provision of the Act, Title VII contains miscellaneous provisions, including 701, which urges transnational corporations to adopt codes of conduct sensitive to the right to freedom of religion.[6]

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